कोई घूरता है तुम्हे
by Surendra Singh on Tuesday, 30 August 2011 at 14:55
तुम लगातार निरीक्षित की जा रही हो
तुम्हारे पल पल की सूचना का वो आकांक्षी है ...
ये आकांक्षा अदम्य है ...,
इतिहास गवाह है इस आकांक्षा का
मैंने - तुमने सींचा है ..इसको
चाहे ....अनचाहे
लाख चाहा,मैंने तुमने ....
तानना ..!
एक उधारी छाता
ये बेबसी है या नियति
जब देखो रिसने लगता है ....................सुरेन
कविता के माध्यम से बहुत ही सशक्त मुद्दा उठाया गया है ..महिला चाहे आर्थिक रूप से स्वतंत्र हो या नहीं , उसको हर कदम पर पुरुषो का आधिपत्य स्वीकार करना पड़ता है ...साथ ही जैसा कि आपने कहा ..
जवाब देंहटाएंमैंने - तुमने सींचा है ..इसको
चाहे ....अनचाहे..............,यह इस बात कि ओर संकेत है कि महिलाये भी न चाहते हुए भी पुरुषो की प्रभुत्व आकांक्षा स्वीकारने के लिए आकुल है पर इसका reason हम सिमोनजी के वक्तव्य में ..कि 'महिला पैदा नहीं होती बल्कि बनाये जाती i है .' में देख सकते है .
आपने बहुत ही सुन्दर बिम्ब का इस्तेमाल करा है ..'उधारी का छाता'..
सच में हम पश्चिम सभ्यता का आवरण तो ओढ़े रहते है पर वास्तविकता के धरातल पर हम मनु sponsored मनुष्य है ..क्या नहीं ?