रविवार, 11 सितंबर 2011

वह आदमी नया गरम कोट पहिन कर चला गया विचार.....की तरह-------------------------मेरी द्रष्टि से .....सुरेन

by Surendra Singh on Sunday, 14 August 2011 at 01:11
वह आदमी नया गरम कोट पहिन कर चला गया विचार
                                                              की तरह i
रबड़ की चप्पल पहिन कर मैं पिछड़ गया i
जाड़े में उतरे हुए कपडे का सुबह छः बजे का वक़्त
सुबह छः बजे का वक़्त , सुबह छः बजे की तरह i
पेड़ के नीचे आदमी था i
कुहरे में आदमी के धब्बे के अन्दर वह आदमी था i
पेड़ का धब्बा बिलकुल पेड़ की तरह था i
दाहिने रद्दी नस्ल के घोड़े का धब्बा ,
रद्दी नस्ल के घोड़े की तरह था i
घोडा भूखा था तो
उसके लिए कुहरा हवा में घास की तरह उगा था i
और कई मकान,कई पेड़ ,कई सड़के इत्यादि कोई घोडा नहीं था i
अकेला एक घोडा था i मैं घोडा नहीं था
लेकिन हांफते हुए ,मेरी साँस हुबहू कुहरे की नस्ल की थी i
यदि एक ही ज़गह पेड़ के नीचे खड़ा हुआ वह मालिक आदमी था
तो उसके लिए
मैं दौड़ता हुआ जूते पहिने हुआ था ,जिसमे घोड़े की तरह नाल
                                                                      ठुकी थी i ------------------------------------------------विनोद कुमार शुक्ल

प्रथमतः  तो एक व्यक्ति का स्वयं का स्वयं से द्वैत नज़र आता है और  उस द्वैत की अनुभूति को अनुभूत करने वाला एक साक्षी तत्व दीखता है ,  पुनश्च ........ द्वैत/द्वन्द  अगर असमान शक्तियों का हो तो विकास तीव्र होता है...तो ये कहा जा सकता है   कि एक व्यक्ति का उर्जावान/ऊश्मावान /सद स्वरुप   व्यक्तित्व जिसकी उर्जा /ऊष्मा क्षणिक है का प्रक्षेपण उस मूल व्यक्ति के समक्ष उसकी समस्त सांसारिक वास्तविकताओं के रहते हुए हो रहा है .क्योंकि  सुबह छह बजे का वक़्त सुबह छह बजे की ही  तरह है  ."----------पेड़ के नीचे ...................".तो यहाँ तक बात आयी कि वह व्यक्ति किन्ही विशेष परिस्थतियो (पेड़) में स्वयं को पाता है ."------------- कुहरे में आदमी के ............".  व्यक्ति अपने वैचारिक झंझावात और जंजालो ( कुहरा ) में उस उर्जावान व्यक्तित्व में स्वयं को देख रहा है . "-----------पेड़ का धब्बा बिलकुल...........". जिन परिस्थतियों में वह स्वयं को फेका हुआ पा रहा है वह उसका मनोमय संसार न होकर वह एक जागतिक /वास्तविक घटना है ."--------------दाहिने रद्दी नस्ल ...............".  व्यक्ति के मन /मस्तिष्क का दाया हिस्सा अर्थात उसका वास्तविक स्व, उतना ही निम्न कोटि का है  ,जितना की उसे स्वयं के बारे में आश्वस्ति है ."---------------घोडा भूखा था .........." व्यक्ति का वास्तविक स्व ( trueself ) अनेक विचारो के उत्परिवर्तन  (mutation )  से गुजर रहा है . एक विचार अगले अनेक विचारो को जन्म देता है .और ये प्रक्रिया अनंत है . कुहरा अर्थात वैचारिक झंझावात और जंजाल, उस वैचारिक mutation  को और हवा दे रहे है ."----------और कई मकान .............."  व्यक्ति को पूर्णतः यह भान है कि वह स्व  (truself ) वही है जिसके होने के आरोपण किसी अन्य चीज़ पर नहीं किया जा सकता ."-------------------अकेला एक घोडा ..............." व्यक्ति को यह दो वास्तविकताए एक साथ पता है ,प्रथम कि उसका एक  trueself  और  द्वितीय इस वास्तविक स्व के अतिरिक्त भी मेरी एक विशुद्ध सत्ता है ."--------------लेकिन हांफते हुए .............." व्यक्ति जब भी अपना अन्तःनिरीक्षण  (introspection )करता है तो वह पाता है कि उसकी चेतना उसी वैचारिक झंझावात और जंजाल से परिचालित हो रही है ."----------------यदि एक ही जगह ................" व्यक्ति उसी समान परिस्थति (पेड़ ) में अपने उर्जावान या सद स्वरुप  को देख रहा है ,और उसको अपनी वास्तविकता भी अनुभूत कर रहा है और यह पाता है कि जो उसका व्यावहारिक सत्य है ,जिन मुलभुत प्रवृतियों से स्वयं को संचालित पाता है ,वाला व्यक्तित्व उस सद स्वरुप को आत्मसात करने के लिए विह्वल तो है लेकिन उस विह्वलता में तथाकथित वास्तविक विडम्बनाये आबद्ध है .

================================इस कविता का निहितार्थ  कई मित्रों के आग्रह पर करने का साहस कर रहा हूँ  .सभी मित्रों से निवेदन है की  वह असहमति की दशा में अपने मंतव्य /संशोधनों  से अवश्य परिचित कराएँ ............................................................................सुरेन

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